बसंत ऋतु की अगवानी

हेमंत आने पर प्रकृति संस्कार में,
संस्कृति लिए अनेकरूप सजाती।
मुरझायी अलसायी प्रकृति संग में,
उर्जित उत्सव उत्साह रंग संवरती।

ठिठुरती धरा आगमन शिशिर संग,
अमृत अर्क तत्व की कायल होती।
आशा के नवल प्रभा स्वस्थ उमंग,
शिशिर हेमंत पित्रों से अजेय बनती।

धवल दिशायें उज्जवलित होकर,
सृजन अंबर बसुधा एकाकार होते।
अजेय है अमृत बहुधा आहुत कर,
उतर दिशा में भानु उदीयमान होते।

अज्ञेय बनाती बसंत बासंती रंगों से,
प्रकृति पंचमी से नव द्रुम प्राणों को,
नाना प्रकार फूलों बिखरी खुशबू से,
तितली भौंरे जगते खुद सामर्थ्य को।

पीत रंगों से सृजित सरसौं कलियां,
खेत खलिहानों की शोभा बिखेरती।
आकर्षित कर गेहूं जौ की बालियां,
कृषक मन आशाओंके पंख लगाती।

हर्षित मन पीत वस्त्र पहन नारियां,
मां सरस्वती का गुणगान हैं करती।
लै गुड़ चना थाल नैवेद्य आरतियां,
नमन में सूर्यदेव को अर्धय चढ़ाती।

विटप में पुलकित होकर नव कोंपल,
प्रसूनों के नवल नवल श्रृंगार करते।
मंडराते इतराते तितलियों के पगों से,
नूतन उमंग पराग से नव जीवन देते।  

अमियां के दूर दूर रसवंती बागों पर ,
जब नये बौराये पुष्प अलंकृत होते।
भौंरे तितली  मस्ती में उड़ उड़ कर,
सरस पीत बौरों के प्रीत बसंती बनते।

सुनील सिंधवाल "रोशन"।

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