बांकुर माटी का

आंसु कैसे थम पायेंगे जिनके पांव कांटे चुभे।
बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।।

भूलना आसान नहीं बांकुर माटी पुत्रों को,
ममता कैसे भूलेगीं अभिन्न देह टुकड़ों को,
यादों के साये होली दिवाली में रंगत कैसे भरें।
बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।।

राजनीति गलियारे गाली देते जांबाजों को,
शहीदी बरसी अपने अश्रु बहाते अपनों को,
देश द्रोही नेता विचारक कैसे राष्ट्र निर्माण करें।
बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।।

बेटी पिता संग होती समर्थ स्वाभिमान को,
अंगुली पकड़ बेटा छू लेता नये आयाम को,
जमा पूंजी बच्चों के सर को कोन प्रतीक बने।
बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।।

वृद्ध अवस्था छलकाते मां बाप अश्रुओं को,
बोझ धरती जिंदगी कुढ़ते अपनी सांसों को,
सहारा बनकर हालातों को अब कोन धीर धरे।
बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।।

पत्नी विवश है मेंहदी और सुहाग चोले को,
ताउम्र विरह में जियेगी सुख दुःख यादों को,
बिन जीवन-साथी श्रृंगार कैसे माथे सिन्दूर भरे।
जिन घर चिराग बुझे, जीने की आस कैसे भरें।।

सुनील सिंधवाल "रोशन"।
27/01/2020

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