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Showing posts from February, 2020

नासूर घावों को मरहम

नासूर बने घावों तिलांजलि देना जरूरी है। पाक परस्त सामंतों को आजादी जरूरी है। मांग रहे आजादी तो खुल के देदो, आजादी संग संकल्प नथी कर दो बहुत तड़फ चाहत हूरों के संग को, हूरों को अब इंतजार मत करने दो। जिंदगी को हूरों का जीवनसाथी जरूरी है। नासूर बने घावों तिलांजलि देना जरूरी है।। कुछ को कश्मीर में दे दी आजादी, अभी पंक्ति सजाये कई कई बैठे हैं। मजहबी प्यार जिनको अलगाव से, अजीब हो तुम टांग अड़ाए बैठे हैं। जन्नत खाली है रिक्त पद भरना जरूरी है। नासूर बने घावों तिलांजलि देना जरूरी है। टुकड़ों टुकड़ों संग में रहना जिनको, आजादी को इनकी भी लिस्ट बना दो। दर्द सहन नहीं होता है मां भारती को, आजादी का समय भी मुकर्रर कर दो। समयानुसार देह समर्पण करना जरूरी है। नासूर बने घावों तिलांजलि देना जरूरी है।। अतिक्रमण शिक्षा मंदिर पे देखा होगा, अब सड़क चौराहों नंगा नाच खेल रहे। कब तक बोझ तले बैठेंगे शहजादों के, उर्वशी मेनका घड़ी में इंतजार देख रहे। नारी सम्मान में जन्नत का ध्यान जरूरी है। नासूर बने घावों तिलांजलि देना जरूरी है।। सुनील सिंधवाल "रोशन"। ----------------------------

बसंत ऋतु की अगवानी

हेमंत आने पर प्रकृति संस्कार में, संस्कृति लिए अनेकरूप सजाती। मुरझायी अलसायी प्रकृति संग में, उर्जित उत्सव उत्साह रंग संवरती। ठिठुरती धरा आगमन शिशिर संग, अमृत अर्क तत्व की कायल होती। आशा के नवल प्रभा स्वस्थ उमंग, शिशिर हेमंत पित्रों से अजेय बनती। धवल दिशायें उज्जवलित होकर, सृजन अंबर बसुधा एकाकार होते। अजेय है अमृत बहुधा आहुत कर, उतर दिशा में भानु उदीयमान होते। अज्ञेय बनाती बसंत बासंती रंगों से, प्रकृति पंचमी से नव द्रुम प्राणों को, नाना प्रकार फूलों बिखरी खुशबू से, तितली भौंरे जगते खुद सामर्थ्य को। पीत रंगों से सृजित सरसौं कलियां, खेत खलिहानों की शोभा बिखेरती। आकर्षित कर गेहूं जौ की बालियां, कृषक मन आशाओंके पंख लगाती। हर्षित मन पीत वस्त्र पहन नारियां, मां सरस्वती का गुणगान हैं करती। लै गुड़ चना थाल नैवेद्य आरतियां, नमन में सूर्यदेव को अर्धय चढ़ाती। विटप में पुलकित होकर नव कोंपल, प्रसूनों के नवल नवल श्रृंगार करते। मंडराते इतराते तितलियों के पगों से, नूतन उमंग पराग से नव जीवन देते।   अमियां के दूर दूर रसवंती बागों पर , जब नये बौराये पुष्प अलंकृत होते। भौंरे तितली  मस्ती में...

बांकुर माटी का

आंसु कैसे थम पायेंगे जिनके पांव कांटे चुभे। बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।। भूलना आसान नहीं बांकुर माटी पुत्रों को, ममता कैसे भूलेगीं अभिन्न देह टुकड़ों को, यादों के साये होली दिवाली में रंगत कैसे भरें। बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।। राजनीति गलियारे गाली देते जांबाजों को, शहीदी बरसी अपने अश्रु बहाते अपनों को, देश द्रोही नेता विचारक कैसे राष्ट्र निर्माण करें। बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।। बेटी पिता संग होती समर्थ स्वाभिमान को, अंगुली पकड़ बेटा छू लेता नये आयाम को, जमा पूंजी बच्चों के सर को कोन प्रतीक बने। बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।। वृद्ध अवस्था छलकाते मां बाप अश्रुओं को, बोझ धरती जिंदगी कुढ़ते अपनी सांसों को, सहारा बनकर हालातों को अब कोन धीर धरे। बुझे चिराग जिस घर जीने की कैसे आस भरें।। पत्नी विवश है मेंहदी और सुहाग चोले को, ताउम्र विरह में जियेगी सुख दुःख यादों को, बिन जीवन-साथी श्रृंगार कैसे माथे सिन्दूर भरे। जिन घर चिराग बुझे, जीने की आस कैसे भरें।। सुनील सिंधवाल "रोशन"। 27/01/2020

बसंत अबना जैई

हरि भरि धरती मा बसंत ऋतुकु म्वौऴ। जडांदि गडग्डांदि गात घामे की झौऴ।। भीठा फ्यौलि फूलूंमा दिखैंण ल्गिन, जौ सरसों पुंगड़ियौं फुल्यारा ह्वैगिन, सगौड़ौं बानि बानि रिंगदा तितलियों टौळ। हरि भरि यीं धरतीमा बसंत ऋतु म्वौळ। खैंणा का जौड़ा अंगर्याल घुमंणांणा, शुकूं का झुंड आरू तिमुलू कच्वौणां, आकाश बिटिन प्वथ्ऴा ख्वजदा ग्ऑऴ। हरि भरि यीं धरतीमा बसंत ऋतु म्वौऴ।। घामकी झौल डाला बौटला मौल्लिन, गाड गधैरूं रौलियौं मा फूल फूलिन, पाख्युं पाख्युंमा धार बिटि घामे झ्वौऴ। हरि भरि यीं धरतीमा बसंत ऋतु म्वौऴ।। सुख्यां पत्गा छौडी बौंण नवांण धन्ना, आमुं का डाळा बौरों का झुंड ख्यनां, सरसरी बथौं ह्युं डाडौं कांठियौं शरीळ। हरि भरि यीं धरतीमा बसंत ऋतु म्वौळ।। सुनील सिंधवाल "रोशन"।